मन की मैल हटा दो

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मन की मैल हटा दो

मन की मैल हटादो,
इक ज्योति जगादो।

तेरे बिन प्रभु कौन है मेरा,
मैं हूँ तेरा तू है मेरा।
निर्मल बुद्धि बनादो,
इक ज्योति जगादो।।१।।

पाप की हैं घनघोर घटाएँ,
बादल गरजे मुझे डराएँ।
इनसे नाथ बचालो,
इक ज्योति जगा दो।।२।।

मन मेरा न काबू आवे,
पग-पग पगला ठोकर खाये।
इसको राह दिखा दो,
इक ज्योति जगा दो ।।३।।

देख लिया है यह जग सारा,
दुःख में देता कौन सहारा।
अपना हाथ बढ़ा दो,
इक ज्योति जगा दो ।।४।।

जीवन थोड़ा सागर भारी,
चप्पू छोटा दूर किनारा।
नैया को पार लगा दो,
इक ज्योति जगा दो ।।५।।

आया भिक्षुक तेरे द्वारे,
मनमंदिर के खोल किवाड़े।
जीवन गीत सुना दा,
इक ज्योति जगा दो ।।६।।

इस कुटिया में आनन्द भर दो,
रोम-रोम प्रकाशित कर दो।
बालक हूँ अपना लो,
इक ज्योति जगा दो ।।७।।

पवित्रता है जहाँ स्वर्ग है वहाँ।
ब्रह्मचर्य है जहाँ, सौन्दर्य है वहाँ।।