मन की गति संवार रे मानव जीवन का उद्धार कर

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मन की गति संवार रे मानव जीवन का उद्धार कर

पर द्रव्येष्वभिध्यानम्, मनसानिष्ठाचिन्तनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधम् कर्म मानसन् ।।

मन की गति संवार रे मानव
जीवन का उद्धार कर,
सत्य संतोष शील संयम से
संशय का संघार कर। टेक।

स्वायंभव मनु महाराज बता गये
तीन पाप होवें मन से,
पापों का परिणाम दुख है
तत्परता शुभ चिन्तन से।
पापों को विसार रे मानव
जीवन का उद्धार कर ।। 1 ।।

प्रथम पाप पर द्रव्येष्वभिध्यानम्
अर्थात पराया द्रव्यहरण,
मन में तरगें उठा करती हैं
मनोवृत्ति कुचेष्टा करण।
कर प्रयत्न सुधार रे मानव
जीवन का उद्धार कर।।2।।

दूसरा मनसानिष्ट चिन्तनम्
अर्थात मन से बुरा चिन्तन,
स्वप्न में भी नहीं करना चाहिये,
इससे होवे कलुषित मन।
शुभ संकल्प उभार रे मानव
जीवन का उद्धार कर।।3।।

तीसरा पाप वितथाभिनिवेश
अर्थात मन से मिथ्या निश्चय,
शोभाराम प्रेमी जीवन में
मन के इन पापों का भय।
मान रहा संसार रे मानव
जीवन का उद्धार कर ।।4।।