मन की शक्ति

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आ तं एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसै। ज्योक्च॒ सूर्यं दृशे ।। ऋः १०. ५७.४

तर्जः माना मानव या परमेश्वर-2491 राग-मेघ मल्हार

मन की शक्ति दो परमेश्वर
मन का जीव जगा दो
जग की ज्वाला जल रही है
आओ तुम ही बचा दो
॥ मन की ॥

मन मेरा निर्जीव हुआ है
निर्बल, बिन उत्साह,
मानों ये मन रहा ना मुझमें,
जागा नहीं उमाह
जीवन-धारा मन्द बह रही (2)
जाग उठी निर्बलता
औषधी, अनगिन खाता फिरता
फिर भी ना कुछ बनता हे
चैतन्य महाप्रभु! आओ
मन-शक्ति को जगा दो।
॥ मन की ॥

नव जीवन सञ्चार करो प्रभु,
मन में बल भर दे,
भांति-भांति शुभकर्म करा दे,
सद्गुण भर भर के,
सूर्यदेव जो जगत प्राण है, (2)
उसका दर्शन दे,
उससे प्रेरित होकर जीऊँ,
दीर्घायु वर दे,
मन-शक्ति मुझ में प्रविष्ट हो
कृपा करो, प्रभु वर दो!

(उमाह) उत्साह, उमंग। (चैतन्य) सचेत ।