मन के नैनों से बाट निहारे
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
ना अन्तर्मन में तुझे देखा
किसको दोष लगाएँ
हे अनन्य !!! शरणों के शरण्य
हे प्रभु प्यारे !!! सुख के कारण
सब कुछ पाकर भी निराश हैं
कैसे करें दु:ख का निवारण
बाट जोहता है क्षत-मानस
भव में गोते खाए
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
विघ्न, क्लेश, बाधा, विरोध है
स्थिरता कहाँ से पाएँ
हर सङ्ग्राम में जूझ रहे हैं
नीचा लोग दिखाएँ
यही तो है सङ्ग्राम जीवन का
इनसे कौन बचाए ?
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
आत्मा प्रचेता समझ गया है
इन्द्रिय देह को चाहिए ज्योति
आसुरभाव कुचलना होगा
मन को बनना होगा बोधी
दें निर्देश देव बन इनको
तेरी कृपा जो हो जाए
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
उत्तम, अधम, व्यथित या हताहत
इन्द्र प्रभु को भुलाते हैं
वाजाभिलाषी आशावादी
शरण प्रभु की जाते हैं
ध्यान निमग्न हो करते आवाहन
याचक-दृष्टि दिखाएँ
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
तेरे द्वार पे याचक आते
त्याग के पापों के जगबन्धन
झोली भर देते हो ‘वाज’ की
जो करता है खुद को अर्पण
उस सरकार के लगे दरबार में
त्याग की भेट ले जाएँ
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
त्याग का भी हमें त्याग है करना
जिससे अहंकार भी जाए
तारनहार त्वरित तरणी को
भव से पार उतारा जाए
सफल करो मनोनीत मनोरथ
दयित दया ही दिखाएँ
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?
ना अन्तर्मन में तुझे देखा
किसको दोष लगाएँ
मन के नैनों से बाट निहारे
प्यासा मन कित जाए ?










