मैं तो प्रभु मिलन के काज
मैं तो प्रभु मिलन के काज
आज कुछ यतन बनाऊँगी।
छोड़ सदा श्रृंगार सादगी
को अपनाऊँगी।
वेदशास्त्र सद् ग्रन्थन
द्वारा ज्ञान बढ़ाऊँगी।।
मैं तो० मुक्ति हेतु मैं कभी
न गंगा-यमुना जाऊँगी।
घर में बैठ पति अपने
से ध्यान लगाऊँगी।।
मैं तो० प्रतिमा के ऊपर
जाकर ना भोग चढ़ाऊँगी।
निराकार और निर्विकार
से ध्यान लगाऊँगी।।
मैं तो० गाकर सुन्दर गीत
देश की शान बढ़ाऊँगी।
दुर्गा सीता किरणमयी
सा नाम कमाऊँगी।।
मैं तो० बुरे कर्म में इस
जीवन को नहीं फँसाऊँगी।
शुभ कर्मों की ज्ञान-गंगा
में रोज नहाऊँगी।।
मैं तो० जन्म मरण से छूट
अमर मैं तो हो जाऊँगी।
‘चन्द्रा’ को ऐसे ही
निशदिन गीत सुनाऊँगी।।
मैं तो०










