मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है दिया।
मैं नहीं, मेरा नहीं,
यह तन किसी का है दिया।
जो भी अपने पास है,
वह धन किसी का है दिया।।
देने वाले ने दिया,
वह भी दिया किस शान से।
‘मेरा है’ यह लेने वाला,
कह उठा अभिमान से।
‘मैं मेरा’ यह कहने वाला,
मन किसी का है दिया।।
मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन……
जो मिला है वह हमेशा,
पास रह सकता नहीं।
कब बिछुड़ जाये यह कोई,
राज कह सकता नहीं।
जिन्दगी का खिला मधुबन,
किसी का है दिया।।
मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन……
जग की सेवा, खोज अपनी,
प्रीति उनसे कीजिए।
जिन्दगी का राज है,
यह जानकर जी लीजिए।
साधना की राह पर,
साधन किसी का है दिया।।
मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन…….
जिस मनुष्य में सन्तुष्टि के अंकुर फूट गये हों, वो संसार के सुखी मनुष्यों में गिना जाता है।










