कृतज्ञता
मैं नहीं मेरा नहीं,
यह तन किसी का है दिया।
जो भी अपने पास है,
यह धन किसी का है दिया। ।।1।।
देने वाले ने दिया तो भी दिया
किस शान से।
मेरा है यह लेने वाला
कह उठा अभिमान से।।2।।
मैं, मेरी यह कहने वाला
मन किसी का है दिया।
मैं नहीं मेरा नहीं,
यह तन किसी का है दिया।।3।।
जो भी मिला है, यह हमेशा
उसके पास रह सकता नहीं।
कब बिछुड़ जायें,
यह कोई राज कह सकता नहीं।।4।।
जिन्दगानी का खिला मधुबन
किसी का है दिया।
मैं नहीं मेरा नहीं,
यह तन किसी का है दिया।।5।।
जग की सेवा खोज
अपनी प्रीत उससे कीजिए।
जिन्दगी का राज है यह
जानकर जी लीजिए।।6।।
साधना की राह पर यह
साधन किसी का है दिया।
मैं नहीं मेरा नहीं, यह तन
किसी का है दिया।।7।।










