मैं क्या हूँ, मैं शरीर हूँ क्या?

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मैं क्या हूँ, मैं शरीर हूँ क्या?

मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?
जन्मों का राहगीर हूँ क्या ?
राहगीर हूँ क्या ?
एक अमर तत्व हूँ क्या ?
या दासत्व में हूँ बन्धा
हूँ बन्धा
मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?

क्या है सन्सार कहाँ जा रहा
मेरा सम्बन्ध है इससे क्या
बन्धन में क्या है परिमितता ?
क्या आदि क्या अन्त इसका
कोई माने जग दु:खी मिथ्या
कोई कहे भ्रमजाल है क्या
भ्रमजाल है क्या
मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?

क्यों संशयों में दब रहा ?
इत उत क्यों मैं भटकता फिरा ?
ज्ञान तृप्ति की ढूँढ रही
कैसे किसे मैं पूछूँ कहाँ ?
दार्शनिक-वैज्ञानिकों से पूछूँ
मेरा यहाँ अस्तित्व है क्या
अस्तित्व है क्या
मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?

कहते हैं ऋतंभरा-प्रज्ञा
करती है जब हृदय-उदय
ना भेद-संशय उठने दिया
हृदय प्रभूत हो गया
वेद विज्ञान शास्त्र पढ़ा
अनजाना भेद भी खुल गया
खुल गया
मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?

अब तो ऋतंभरा प्रज्ञा से
मैं बना हूँ ज्ञानवृद्ध
सांसारिक ज्ञान में क्यों फसूँ
अब तो मैं पा चुका हूँ प्रज्ञा
प्रयत्न मेरे सफल हुए
पाकर प्रज्ञा ऋतंभरा
ऋतंभरा
मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?
जन्मों का राहगीर हूँ क्या ?
राहगीर हूँ क्या ?
एक अमर तत्व हूँ क्या ?
या दासत्व में हूँ बन्धा
हूँ बन्धा
मैं क्या हूँ
मैं शरीर हूँ क्या ?