मैं कभी, ना दिल से बिसराऊँ।

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मैं कभी, ना दिल से बिसराऊँ।

तर्ज – मैं कहीं कवि ना बन जाऊँ

मैं कभी, ना दिल से बिसराऊँ।
तेरा नाम हे मैं कभी…… विधाता ।।

बनकर के भक्त आया,
नादान हूँ मैं भगवन ज्योति
जगा दो ऐसी, महके जो मेरा
जीवन आया सचिन “सारंग”,
करने को ज़ीस्त अर्पण मैं कभी……

हर शै में इस जहाँ की,
जगदीश तू समाया
चारों तरफ ये फैली,
तेरे करम की छाया ना कोई
ये जान पाया,
कैसी है तेरी माया मैं कभी……

पाषाण मैंने पूजा,
और पूजा की शुञ्जर
की तुझको ना देख पायी,
शक्ति मेरी नज़र की है
दूर मेरे दाता, नज़रों से
तू बशर की मैं कभी……

तेरे सिवा जहाँ में,
कोई ना आज मेरा बिन
तेरे हे प्रभु जी,
ज़िन्दगी में है अंधेरा
वरदान ऐसा दे दो,
जीवन में हो सवेरा मैं कभी……