मैं अब बन्धन सह न सकूँगा।।
मैं अब बन्धन सह न सकूँगा। । टेक ।।
युग-यग, के वह शत् सह बन्धन,
जिनमें बन्दी मेरा जीवन।
करके विधि ने जड़ता के वश,
रखा अब मैं रह न सकूँगा।।1।।
जिसने सारी जग लीला रच।
मुझको फांसा आप रहा बच।
ऐसे वंचक विधि के करकी
स्वयम् को पुतली कह न सकूँगा।।2।।
मैं भी विधि सा मुक्त विहग,
आवास यही मेरा भी जग।
मैं भी सीमातीत सुखों का,
क्यों रस विधि सम लह न सकूँगा।।3।।
अब तक तो चुपचाप रहा मैं,
वातावरण विपरीत सहा मैं,
जिधर बहाया उधर बहा मैं,
“प्रेमी” तृण सम बह न सकूँगा।।4।।










