महर्षिवर ने रचना करके सत्यार्थ प्रकाश की।
महर्षिवर ने रचना करके,
सत्यार्थ प्रकाश की।
परम्परागत जोड़ दी,
कड़ी टूटे इतिहास की।।
महाभारत के बाद,
अविद्या अन्धकार का युग आया।
वेद मार्ग से भटक,
मतों पन्थों ने सबको भटकाया ।।
ईश्वर के गौणिक नामों की,
भ्रांति में जग भरमाया।
कल्पित देवी देवताओं का,
भजन जाप कीर्तन गाया।
ओंकारादि नामों की,
व्याख्या प्रथम समुल्लास की ।।1।।
दूसरे समुल्लास में विधिवत्
मानव का निर्माण लिखा।
माता पिता गुरू की,
शिक्षा का प्रथम स्थान लिखा ।।
तीसरे समुल्लास में पठन-पाठन
का सही विधान लिखा।
चौथे में विवाह और गृहस्थ
आश्रम धर्म व्यवहार सम्मान लिखा।
पांचवे समुल्लास में
विधि है वानप्रस्थ संन्यास की।।2।।
छठे समुल्लास में राज धर्म
सातवें में वेद ईश्वर विचार।
आठवें समुल्लास में जग की
रचना पालन और संहार ।।
नोवें समुल्लास में विद्या
अविद्या वन्ध मोक्ष अधिकार।
दसवें समुल्लास में भक्षाभक्ष
और आचार अनाचार ।
पूर्वार्द्ध दस समुल्लास हैं
कुँजी आत्म विश्वास की।।3।।
ग्यारवें समुल्लास में,
भारतीय मत पन्थों का खण्डन।
बारवें समुल्लास में चारवाक्
और जैन बोद्ध वरनन।
तेरखें समुल्लास में ईसाइयत
का करा दिया दर्शन ।।
चौदवें समुल्लास में इस्लाम
मत की दूर करी उलझन ।।
आज विश्व में धूम मची है
‘प्रेमी’ के प्रयास की।।4।।
रुबाई
न आंसू अलग है न आहें अलग हैं,
न मंजिल अलग न राहें अलग हैं,
मगर सोचता हूँ मैं कुछ सिर फिरों की,
वतन के लिये क्यों निगाहें अलग हैं।।
रुबाई
आदमी वेमौत फिर मरने लगा
आदमी से आदमी डरने लगा
दुश्मनों से दोस्ती तो दूर है
यह दोस्तों से दुश्मनी करने लगा।।
रुबाई
तू किसी का अपना न पराया होता
भ्रम जाल तेरे नाम पर न छाया होता
हिन्दु व मुसलमान ईसाई बनाने वाले
तूने इन्सान को इन्सान बनाया होता।।










