महर्षि सत्य द्वार खोल गए जग को वैदिक धर्म से जोड़ गए
तर्ज: हमसफर साय अपना छोड़ चले ।
महर्षि सत्य द्वार खोल गए जग को वैदिक धर्म से जोड़ गए
महर्षि सत्य….
धर्म का जब प्रकाश ही न रहा, ना अटल वेदों पे विश्वास रहा,
रत्न वेदों के अनमोल दिये, लोग हुए ॥ जग को….
आर्य जाति का ना था नामोनिशाँ,फैला अज्ञान ज्ञानदीप बुझा
हमको वेदों की ओर मोड़ गए, लोग हुए ॥ जग को….
पाप पाखण्ड उखाड़े थे जड़ से, थे सुधारक वो पाँव तक सर से
धर्म आया अधर्मी दौड़ गए ॥ जग की….
करके मंथन रचा सत्यार्थ प्रकाश, सत्य के प्यासों की बुझा दी
भ्रमजाल सारे तोड़ गए ॥ जग को…
राह वेदों की ऋषि चलते रहे, थे कुपथ पर उन्हें बदलते रहे
गढ़ पाखडियों के तोड़ गए ॥ जग को…
कष्ट आए, धीरज से सहते रहे, राह काँटो की थी गुज़रते रहे
दुःख में ऋषि सुख का साथ छोड़ गए ॥ जग को….
जो भी थे कर्म ऋषि के थे निष्काम, समझो प्रभु से मिला महावरदान
धन्य हैं हम, जो देव लोग दिए ॥ जग को…
त्याग तप धर्म और सत्य दया, शब्दों में कर सके ना हम तो वयाँ
ईश-धन के खज़ाने खोल गए ॥ जग की…
पी के विष बाँटते रहे अमृत, ना किया दुष्टों का कभी भी अहित
न्याय दण्ड सब प्रभु पे छोड़ गए ॥ जग को…
ऐसे विरले ही लोग जग से गए, कोई जाता नहीं यूँ हँसते हुए
इस महात्मा को प्रभु थे खोज रहे ॥ जग को…..
जब थे ऋषि साथ हम संभलते रहे, उनके आदशों पे हम चलते रहे
आज क्या बात मुँह को मोड़ चले ॥ जग को…
हम ऋषि तुझको नमन करते रहें, सार्थक तेरे सपन करते रहें।
जग में जलती वेदों की ज्योत रहे ॥ जग को….










