महर्षि मनु ने मनुस्मृति में धर्म के जिन दस लक्षणों का उल्लेख किया है, वे सार्वभौम नैतिक मूल्य हैं, जो किसी भी व्यक्ति के लिए अनुकरणीय माने जाते हैं। ये लक्षण न केवल व्यक्तिगत आचरण को सुधारते हैं बल्कि समाज में नैतिकता और शांति बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।
“धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं – शौचम् इन्द्रियनिग्रह धीर्विद्या सत्यम् अक्रोधो – दशकं धर्मलक्षणम् ।” (मनुस्मृति 6.92)
धर्म के दस लक्षण
- धृति (धैर्य और स्थिरता) – किसी भी परिस्थिति में विचारपूर्वक निर्णय लेना और आत्मसंयम बनाए रखना।
- क्षमा (सहनशीलता) – शक्ति होते हुए भी बुराई का बदला न लेना और सहनशील बने रहना।
- दम (मन का नियंत्रण) – मन में अच्छे विचारों को बनाए रखना और बुरे विचारों को दबाना।
- अस्तेय (चोरी न करना) – मन, वचन और कर्म से किसी भी प्रकार की चोरी या छल न करना।
- शौच (पवित्रता) – शरीर, मन और वाणी को स्वच्छ और शुद्ध रखना।
- इन्द्रियनिग्रह (इन्द्रियों पर संयम) – आंख, कान, वाणी आदि को अनुशासित रखना और बुरे विषयों से दूर रखना।
- धी (बुद्धि का विकास) – सत्य और ज्ञान के मार्ग पर चलकर बौद्धिक और मानसिक उन्नति करना।
- विद्या (ज्ञान प्राप्ति) – भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के ज्ञान को अर्जित करना।
- सत्य (सत्य का पालन) – मन, वचन और कर्म से सत्य बोलना और झूठ से बचना।
- अक्रोध (क्रोध पर नियंत्रण) – क्रोध के कारण उपस्थित होने पर भी धैर्य रखना और शांत बने रहना।
आज के संदर्भ में इनका महत्व
आज के समय में भी ये गुण उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे। धैर्य और क्षमा से जीवन में शांति बनी रहती है, जबकि सत्य और विद्या से व्यक्ति समाज में सही दिशा में आगे बढ़ता है। इसी प्रकार, इन्द्रियनिग्रह और अक्रोध से मानसिक संतुलन बना रहता है। यदि व्यक्ति इन गुणों को अपनाए, तो न केवल उसका जीवन सुधरता है बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव आता है।
ये दस लक्षण केवल धार्मिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि एक आदर्श जीवन जीने के मूलभूत सिद्धांत हैं।










