महर्षि दयानन्द सरस्वती: एक क्रांतिकारी विचारक
किसी भी महापुरुष के विचारों का अध्ययन उनके जीवन, शिक्षा, संस्कार और मानसिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में किया जाना चाहिए। महर्षि दयानन्द सरस्वती जैसे युगपुरुष के विचारों की विवेचना करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश भाग एक संन्यासी के रूप में व्यतीत किया।
लेकिन वे केवल सांसारिक मोह से मुक्त होकर साधना में लीन रहने वाले संन्यासी नहीं थे, बल्कि समाज के कल्याण के लिए सतत चिंतित रहने वाले महान सुधारक भी थे। उन्होंने समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए कार्य किया और समाज की पीड़ा, दुख व कष्टों के निवारण के लिए निरंतर प्रयासरत रहे।
परिवार और प्रारंभिक जीवन
महर्षि दयानन्द का जन्म एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण परिवार में हुआ, जहाँ परम्परागत धार्मिक आस्थाओं और सामाजिक व्यवस्थाओं का कठोरता से पालन किया जाता था। उनका बचपन भी इन्हीं परंपराओं के अनुरूप बीता। प्रारंभिक शिक्षा में धार्मिक कर्मकांडों, पूजा-पद्धतियों और रूढ़ियों का गहरा प्रभाव था।
परंतु, यह एक अद्भुत संयोग था कि इतने रूढ़िवादी वातावरण में पले-बढ़े होने के बावजूद वे धार्मिक मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सफल हुए। उन्होंने धर्म को एक संकीर्ण दायरे में बांधने के बजाय उसे तर्क और न्याय की कसौटी पर परखा।
समाज और युगचेतना
महर्षि दयानन्द का जन्म उस युग में हुआ जब भारत के लोग पश्चिमी शिक्षा, विज्ञान और तर्क के प्रभाव में आ रहे थे। भारतीय समाज यह समझ नहीं पा रहा था कि पश्चिमी विचारों को अपनाने से उनकी अपनी पहचान प्रभावित होगी या नहीं। इसी असमंजस के बीच भारतीय नवजागरण का आरंभ हुआ।
इस काल में राजा राममोहन राय जैसे सुधारकों ने समाज सुधार की चेष्टाएँ कीं। परंतु जहाँ अधिकांश समाज सुधारकों ने पश्चिमी शिक्षा और यूरोपीय विचारों से प्रेरणा ली, वहीं महर्षि दयानन्द पूरी तरह भारतीय परंपरा से जुड़े रहे। उन्होंने वेदों को ही सत्य और ज्ञान का सर्वोच्च स्रोत माना तथा समाज को पुनः वैदिक मूल्यों की ओर लौटने का संदेश दिया।
धर्म की व्यापक परिभाषा
महर्षि दयानन्द मूलतः धार्मिक विचारक थे, लेकिन उनका धर्म संकीर्ण दायरे तक सीमित नहीं था। उन्होंने धर्म को उसकी वास्तविक परिभाषा में प्रस्तुत किया—
“जो न्याय, सत्य, अहिंसा और निष्पक्ष आचरण पर आधारित हो तथा वेदों के सिद्धांतों के अनुरूप हो, वही धर्म है।”
उनके अनुसार धर्म किसी एक पंथ, जाति या संप्रदाय तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने वेदों को सार्वभौमिक ज्ञान का स्रोत माना और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वेद किसी काल विशेष में लिखी गई पुस्तक नहीं, बल्कि शाश्वत ज्ञान का भंडार हैं।
निष्कर्ष
महर्षि दयानन्द सरस्वती न केवल एक धार्मिक सुधारक थे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भी जागरूकता लाने वाले महान क्रांतिकारी विचारक थे। उन्होंने भारतीय समाज को रूढ़ियों से मुक्त करने, महिलाओं की शिक्षा, जाति-पाति के भेदभाव को मिटाने और सत्य को अपनाने का संदेश दिया।
उन्होंने आर्य समाज की स्थापना कर यह सिद्ध किया कि भारत का नवोत्थान केवल पश्चिमी शिक्षा पर निर्भर नहीं है, बल्कि वैदिक ज्ञान और तर्कसंगत विचारधारा में ही राष्ट्र की उन्नति का आधार निहित है। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और समाज को सही दिशा में मार्गदर्शन देते हैं।
“वेदों की ओर लौटो!” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि महर्षि दयानन्द का भारत को दिया गया अमूल्य संदेश था, जो आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनके समय में था। 🚩










