महर्षि दयानन्द जी:

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वह 🌿 मूलशंकर था, ✨ चैतन्य था, 🔥 महाचैतन्य था, 🌞 दयानन्द था! वह 📖 सरस्वती था, 📜 वेदरूपी सरस्वती को इस धरातल पर प्रवाहित कर गया। वह 🕉️ स्वामी था, 🧘 सन्यासी था, 🚶 परिव्राट था! वह 🙏 दण्डी था, 🧎 योगी था, 👑 योगिराज था, 🔥 महा तपस्वी था!

योग सिद्धियों से संपन्न था, लेकिन उनसे 🌀 अलिप्त था। वह 🧐 मनीषी था, 🔱 ऋषि था, 🌿 महर्षि था, 📖 चतुर्वेद का ज्ञाता तथा 🔆 मन्त्रद्रष्टा था।

वह 🔱 ब्रह्मचारी था, 🌟 ब्रह्मवेत्ता था, 🌈 ब्रह्मनिष्ठ था, 🕊️ ब्रहमानंदी था। वह 🔥 अग्नि था, 💪 परम तपस्वी था, 🌟 वर्चस्वी था, 🔆 ब्रह्म वर्चस्वी था।

इस धरातल पर 🕉️ शंकर होकर आया था। ⚡ शंकर के मूल खोज कर गया और 🌞 दयानन्द बनकर अपनी ❤️ दया संसार पर कर गया।

नश्वर देह के मोह को त्याग कर 😀 हंसते-हंसते प्रसन्नता से, 🕉️ परम प्रभु के प्रेम में मस्त होकर 🔱 ब्रह्मानंद में विलीन हो गया।

🌟 एक अपूर्व जीवन, एक अद्भुत क्रांति, एक महान आशा का संचार, एक अद्भुत जीवन-ज्योति इस जगत में अनंत समय के लिए छोड़ गया!


🚀 उसकी साधना और महानता

वह 🕉️ शंकर था—निस्संदेह 🔱 शंकर ही था।

🙏 प्राणिमात्र के कल्याण के लिए, 🌎 विश्व के कल्याण के लिए उसकी 🔥 अमर साधना थी। उसके जीवन का ⏳ एक-एक क्षण उसकी पूर्ति में लगा।

हम जिस धरातल पर हैं, वह 🛕 उससे बहुत ऊंचाई पर था। वह ✨ शुद्ध चैतन्य था।

उसने हमारे अंदर ⚡ चेतना का संचार किया। हमारे 🌍 विश्व की जातियों में, हमारे 🏹 धर्म-कर्मों में, जो ⚫ निस्तेजता, प्राणहीनता और मलिनता गहरी जड़ें जमा चुकी थीं, उसे 🔆 ब्रह्म वर्चस से नष्ट कर दिया।

उस 💡 चैतन्य ब्रह्मचारी से चेतना एवं प्राण प्राप्त कर 💪 आज हम जीवित हैं, 🏆 गौरवशाली हैं।


📖 वह वेदों का समुद्र था

वह 📜 सरस्वती था। 📖 वेद विद्या का अपार और अथाह समुद्र था।

🛕 काशी की पंडित मंडली ने उसकी थाह लेनी चाही, परन्तु वे सब 💨 उसकी गहराई तक नहीं पहुंच सके

📜 मत-मतांतरों के विद्वानों ने भी अनेक बार 🧠 उनके अगाध ज्ञान की थाह लेनी चाही।

🌊 उनके ज्ञान-सागर में गोते लगाए, परन्तु वे 🏃 स्वयं अपने प्राण बचाकर भाग खड़े हुए!

वह 🌊 खारा समुद्र नहीं था, अपितु 🍯 अत्यंत रसवान समुद्र था।

उसके पास जो जाता, 💡 तृप्त होकर ही आता था।


👑 वह स्वामी था, राजा नहीं!

🛕 विश्वनाथ मंदिर का वैभव 👑 काशी नरेश ने अर्पण करने की प्रार्थना की।

🏰 उदयपुर महाराणा ने भी 🛕 एकलिंग की गद्दी उनके चरणों में अर्पित की।

परन्तु वह ❌ लोभ-लालच से विचलित होने वाला नहीं था

🚩 ब्रिटिश शासन काल में, ⚔️ पराधीन भारत में, 🔥 स्वराज्य की सर्वप्रथम भावना का उसने निर्भय होकर सूत्रपात किया।

वह ❌ भय से विकंपित होने वाला नहीं था

वह 🕉️ मृत्यु से भी विचलित होने वाला नहीं था

वह 🔥 मृत्युंजयी था।


🧘 वह योगी थे, त्यागी थे

उसने 🔥 तपस्या से अपने शरीर, मन और अंतःकरण को पवित्र किया था।

🕉️ पवित्र अंतःकरण में वह 🌟 नित्य ब्रह्म का दर्शन करता था।

वह 📖 ब्रह्म के आनंद में नित्य निमग्न रहता था।

अतः वह 💪 निर्भय था, 🔆 निर्भ्रम था, ❌ निःशंक था।

उसके 🌟 चारों ओर आनंद का ही साम्राज्य था।


🌍 वह जगत को जागृत करने वाला था

वह ⏳ कभी न थकने वाला और ❌ विश्राम न करने वाला था।

वह 🚀 सदा जाग्रत और ⚡ जागरूक था और 🔅 सबको जगाने वाला था।

उसने 🔥 सबको ज्ञान-ज्योति से प्रबुद्ध किया।

🕉️ योगसाधना में रत रहकर केवल 🔆 अपना ही उद्धार करने वाला वह नहीं था।

वह 💡 योगिराज था।

🛕 भोगों की लालसाओं के पर्वत उससे टकराकर 💥 चकनाचूर हो जाते थे

🌊 अज्ञान, अविद्या के भयंकर प्रलयंकारी तूफान वहां शांत हो जाते थे।

वह 🚀 त्याग में अनुपम था, 🔥 तपस्या में अनुपम था, 📖 ज्ञान में अनुपम था।


🙏 उसकी स्मृति अमर है!

जो कार्य कोई अन्य ❌ न कर सका, वह कार्य ⚡ महर्षि दयानन्द ने 🌍 विश्वकल्याण के लिए कर दिया।

इसलिए हम 💖 उनके कृतज्ञ हैं, उनके आगे 🙏 नतमस्तक हैं।

महर्षि का 🎉 जन्मदिवस आया है।

देश की जनता 🥳 उसे बड़े हर्ष और उल्लास से मनाती है

मैंने सभी को 😀 प्रसन्नचित्त देखकर पूछा –

“महर्षि दयानन्द क्या थे?”

उन्होंने 🔥 तुमुल घोष में कहा-

“🚀 वह महर्षि महान् था!
🌟 महान्तर था!!
🕉️ महानतम था!!!”

🔱 🚩 वैदिक धर्म की जय! 🚩 🔱

✍ लेखक: श्री वीरसेन वेदश्रमी
📩 साभार: डॉ_विवेक_आर्य