महासती अनुसुइया का नारी धर्म पर सीता जी को सदुपदेश
महासती अनुसुइया का नारी धर्म
पर सीता जी को सदुपदेश
अनुसुइया समझावे,
सीता को नारी धर्म।। टेक ।।
क्या रखा इन चमकदार
कटियों पटियों में झूमर में।
है शीसफूल सच्चा सिर का,
सिर झुके बड़ों के आदर में।।
पतिधर्मश्रवण हो श्रवणों से
यह श्रवण फूल अति उज्ज्वल हो।
हो तेज भाल की बेंदी तो
लज्जा आँखों का कज्जल हो।।
शुद्धता नासिका की बेसर,
दांतों की चमक स्वच्छता हो।।
आ जाये जितेन्द्रियता का
रंग बस यही कपोल लालिमा हो।।
भुजबन्द भुजाओं के ये ही
स्वाभाविक पुष्ट भुजायें हो।।
अंगुली की मुद्री या छल्ले
अनगिनत शिल्पकलायें हों।।
तत्परता के साथ निभाये
नारी यह नित्य कर्म।।1।।
जिन हाथों के प्यारे भूषण
चक्की चर्खा सिल बटना हैं।
उनके आगे क्या वस्तु भला
हथफूल आरसी कंगना हैं।
जो हाथ दास बनकर धर के
धर को रोटियाँ खिलाते हैं।।
पहुँचियां पछले या तोड़े
उनसे सर्वदा लजाते हैं।
कंठी तो यही कंठ की है
माधुरी कंठ में घोली हो।
मुख का भी यही ताबूल है
रसवाली मीठी बोली हो ।।
हो उर पर श्रद्धा का जुगनू
मणि माला सावधानता की।
सत्यता चन्द्रसैनी तो चम्पाकली
धीरता की ।।
सत्यता सत्य श्रृंगार नारी
का नहीं असत्य अर्धम ।2।
पति प्रियता का नौलखा हार,
गर्दन पर और हृदय पर हो।
पतिव्रत ब्रह्ममचर्यव्रत की
कटि पर कर धनी मनोहर हो।।
पति आज्ञा में जम जाय
पावं यह लच्छे छड़े पांव के हों।
सतपथ पर चलते रहे पांव
यह बिछवे छड़े पांव के हों।।
तन पर सौभाग्यशीलता की
साड़ी चोली नवशोभित हो।
तब देख-2 उस नारी को
देवियां स्वर्ग की लज्जित हों।।
यह है नारी जाति के
आभूषण सुखद श्रृंगार सुनों।
हो जाती है प्रकृति भी
जिस ऊपर बलिहारी सुनो।।
कठोर से भी कठोर सदा
रहती है नर्म से नर्म ।।3।
चार भांति की नारियां रहती हैं
इस जग के बीच सुनो।
अति उत्तम हैं प्रथम फिर
उत्तम मध्यम और नीच सुनो।।
अति उत्तम वह कहलाती है
जिसकी बस टेक एक ही हो।
जिनका कि एक ही ध्येय
ध्यान व्रत आर विवेक एक ही हो ।।
पति ही व्रत है पति ही
गति है पतिमय सारा घरबाहर है।
पति इष्टदेव आराध्य देव
पत्नि का पति परमेश्वर है।।
कैसा पूजन या उद्यापन
नारायण या चन्द्रायण है।
बैकुण्ठ उसे उसका घर है
दिल में जिसके नारायण है।।
अति उत्तम नारी का होता है
अति उत्तम मर्म ।।4
उत्तम पति को पति जान
सदा तन मन से सेवा करती हैं ।।
पति प्रसन्न रखने के हित
सारी परिचर्या करती हैं।
पति के अतिरिक्त दूसरों को
भाई की भांति जानती हैं।।
जेठों को पिता समझती है
छोटों को पुत्र मानती हैं।
ब्रह्मयज्ञादि पंच महायज्ञ
घर में नित्य रचाती है।।
पति संकट की साथिन हो
पतिव्रत धर्म निभाती है।
यह लक्षण उत्तम नारी
का धर्म कर्म शर्म ।।5।।
औरों की देखा देखी
जो मर्यादा पाले रहती है।
लज्जा भय और परिस्थति
वश निज धर्म संभाले रहती है।
चंचल मन होने पर भी
संगती के कारण नीकी है।
ऐसे आचरणों की नारी
जग में मध्यम श्रेणी की है।
इससे नीची नारी जो है
निकृष्ट जग बीच सुनो।
जाति वर्ण कुल जन्म को
जो कलुषित करती है नीच सुनों।।
नारी का पति वंचक होना
दोनों ही जगत बिगाड़ना है।
इस जग में लोग हंसाई है
उस जग में नर्क यातना है।
व्याभिचारिणी को इस पृथ्वी
पर कहता है नहीं भला कोई।
न्यायालय में ईश्वर के भी
करता नहीं क्षमा कोई ।।
बना देता है नर्क गामिनी
जीवन में कुकर्म ।।6।।
पति की सेवा ही नहीं
केवल शुभ कर्म एक नारी का।
गृहस्थी जीवन में और
भी है पालन स्वधर्म एक नारी का ।।
गौरी शंकर समतुल्य सदा
जब सास ससुर की सेवा हो
तब गणनायक की भांति
पति परमेश्वर की सेवा हो ।।
घर में जो हो पति की
भगिनी देवरानी हो जेठानी हो।
उन सबकी दासी बन जायें
तो नारी घर की रानी हो।।
घर ही में काम और धन्धा
जब व्रत हो अष्ठपहर उसका।
तब घरवाली गृहलक्ष्मी हो
बैकुन्ठ सदृश हो घर उसका ।।
मुख्य कर्म एक और नारी
का सुनों मिटादू भ्रम ।।7।।
परलोक दृष्टि से उच्च
धर्म पतिव्रत ही समझा जाता है।
पर जग मे उससे भी ऊंचा
शिशु पालन कर्म कहलाता है।।
कारण नारी से विश्व।
सदा उत्तम सन्तान चाहता है।
पत्नि के साथ-साथ वह
तो माता गुणवान चाहता है।।
सन्तान हेतु ही होती है
भूतल पर सृष्टि नारियो की।
है प्रकृति पापिनी पड़े नहीं
जो इस पर दृष्टि नारियों की ।।
अतएव धर्म है नारी का
उत्तम सन्तति पालन समझे।
जननी का जन को देने में
जननी को जननीपन समझे ।।
पतिव्रता पत्नि पर ‘प्रेमी’
प्रसन्न पूर्ण ब्रह्म ।।8।
सावधान
अच्छी बातें बुरी लगें बुरी बात
मन को लुभाने लगे समझों
हैं नाश के दिन निश्चित
जब अपने बेगाने लगे।।
मार्ग से चलते चलते
जब सावधानी हट जाती है
क्षमा प्रकृति नही करती
वहीं दुर्घटना घट जाती है।।










