माँगू तुम्हीं से कि तुझको ही पाऊँ
तेरी भक्ति में अपने मन को लगाऊँ !!
ये जग के प्रलोभन क्यूँ हरदम सताएँ
काँटों के घेरे में ले जा फँसाएँ
दो शक्ति प्रभु जग के बन्धन हटाऊँ !!
यहाँ कौन मेरा कहूँ जिसको अपना
जुदा होगे इक इक लगेगा ये सपना
रहे संग उसे क्यूँ ना अपना बनाऊँ ॥
धन-धान्य से है भरा जग सरोवर
मगर चाहूँ आनन्द जो तेरी धरोहर
मेरे सच्चिदानन्द शरण तेरी आऊँ ॥
प्रभु चाहे ना दे तू दुनियाँ की दौलत
मगरदे वो दौलत हूँ जिसकी बदौलत
तुझे छोड़ ना मैं किसी दर पे जाऊँ ॥
प्रभु आओ जीवन को मेरे सजाओ
मुझे अपनी भक्ति का मार्ग सुझाओ
अमर वेद अमृत तुम्हीं से ही पाऊँ ॥
तर्ज: आँसू भरी हैं ये जीवन की राहें










