लज्जित है दाग से तो नभ में पूजन चन्द।
लज्जित है दाग से तो
नभ में पूजन चन्द।
बेदाग ही जहां से गया
स्वामी दयानन्द॥ टेक ॥
हम उसको पहिचान सके ना,
रक्षक था वह जान सकेना।
वेद भाष्य करता योगी की
बात को मान सके ना॥
समझे ना प्रश्न कर करके
मिचाया द्वन्द॥1॥ बेदाग…
दोष पै दोष लगाये हमने,
जुल्मों सितम भी ढाये हमने ।
गालियां तक दी ईंट और
पत्थर भी वर्षाये हमने॥
गम ने नहीं उसको घेरा
मुस्काया मन्द-मन्द॥2॥ बेदाग…
पाप घृणा हिंसा से परे था,
सभ्धारण से ना टरे था।
गौतम कपिल कणाद जैमनी
की भी चर्चा करे था।
विचरे था मस्त होकर
तन से भी था बलन्द ॥3॥ बेदाग…
कहा पाखण्ड से मुख को मोडो,
एक प्रभु से नाता जोडो।
कण्ठी तिलक मुर्ति पूजा
मृतक श्राद्ध को छोडो॥
तोड़ो जो दुख के बन्धन
‘कर्मठ’ कट जायें फन्द॥4॥










