लड़के ऐसे भड़के तहजीब के सिर पर चढ़के।

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लड़के ऐसे भड़के तहजीब के सिर पर चढ़के।

लड़के ऐसे भड़के तहजीब
के सिर पर चढ़के।
चाकू छुरा चलाना सीखे
गैर की विद्या पढ़के ।।

१ दोषी पिता और मम्मी है,
घर की शिक्षा ही निकम्मी है।
पिता तो खुश है डैडी बनकर,
माता बन गई मम्मी है।
सभ्यता तभी तो कायम नहीं,
सन्ध्या हवन का टाईम नहीं।
आधी रात सोवें टी०वी०
देख फिर कैसे उठेगें तड़के……

२. वेद शास्त्र का नाम नहीं,
गीता रामायण से काम नहीं।
अपने आपको भूलने का,
होता अच्छा अन्जाम नहीं।
धर्म की कोई मर्याद नहीं,
अपना दादा तो याद नहीं।
पर देवानन्द और दलीप की
पीढ़ियां रोज सुनावें पढ़के……

३. इल्म ने उलटी जहर भरी,
नजरें हो गई कहर भरी।
आज की शिक्षा ने नसलों के
नस-नस में है जहर भरी।
देश को जो नुकशान करें,
आदमी को हैवान करें।
ईश्वर करे वो सभी पुस्तकें
खाद हो जाएं सड़कें….

४. अपने ही देश में बसते हैं,
अपनी तहजीब पे हंसते हैं।
मेरे देश के बेटे-बेटियों पर
आवाजें कसते हैं।

बड़ा कोई समझावे इन्हें,
अच्छी बात बतावे इन्हें।
तो झट जेब से चाकू निकाल
के खडे हो जाये अडके….

५. उस्ताद को गुरू मानते थे,
सम्मान भी करना जानते थे।
मेरे देश के बच्चे तब नेकी
व बदी पहचानते थे।
गुरू का आदर करते थे,
इल्म से झोली भरते थे।
पर आज शिष्य के डर से
मास्टर जी का कलेजा धड़के…

६. नत्थासिंह जिम्मेवार बनो,
इस धरती पर ना भार बनो।
दुश्मन से टकराने को,
फौलाद की अब दीवार बनो।
फैशन में गर धसे रहे,
कंघे शीशे में फंसे रहे।
तो पाक-चीन से गये इलाके
कैसे लोगे लड़के…..