क्यों दूर है इस भक्ति से
क्यों दूर है इस भक्ति से,
प्रभु भक्ति कि शक्ति से ।
मगरूर क्यों है मस्ति से,
पुछ कुछ इस हस्ति से ।
ये जीवन तो एक दिन जाना है,
लौट के नहीं आना ।।०।।
अन्तरा – इस मन मन्दिर में
वो है उनकी प्यारी मुरत ।
जहां भी देखो वहीं दिखे,
उनकी प्यारी सुरत ।।
तू कर्महिन क्यों होया,
क्यों व्यर्थ की बात में खोया ।
दुनियां जागी तू सोया,
जब आंख खोली तो रोया ।।
ये जीवन तो एक दिन… ।।१ ।।
गुजरान यहां कुछ दिन की,
दुनियां एक सराए ।
जग दो दिन का मेला
कोई आये कोई जाये ।।
जो चाहो कर कुछ पाना,
उस प्रभु का ध्यान लगाना ।
जीवन चाहो तर जाना,
प्रभु के चरणों में आना ।।
ये जीवन तो एक दिन ।।२।।
गुरू वचणों में बहती है,
इक अमृत की धारा ।
जिसने पीया है अमृत,
उसने जीवन संवारा ।।
वो ही तो है महादानी,
सब उसकी मेहरवानी ।
अब तो छोड़ नादानी,
सुन वेद की अमृत वाणी ।।
ये जीवन तो एक दिन जाना… ।।३।।










