क्यों मनमानी करें सन्मार्ग क्यों ना चले
क्यों मनमानी करें
सन्मार्ग क्यों ना चले
यज्ञ के भाव रहे इदन्नमम्
करें यज्ञ सदा
ना बन कृपण
बन त्यागी सूच
जीवन की नैया
ना जाए डूब
अग्रगामी है प्रभु
अनुगामी तू
यज्ञ के भाव रहे इदन्नमम्
करें यज्ञ सदा
सागर दया के
हैं प्यारे प्रभु
सत्य ज्ञान पथ
उसके चलूँ
यज्ञ कर्म में
मैं संयुक्त रहूँ
यज्ञ के भाव रहे इदन्नमम्
करें यज्ञ सदा
सूर्य चन्द्र अग्नि तारे अवनी
सृष्टि नियम में है अग्रणी
ऋत सत्य पर चलें
चलें हम भी
यज्ञ के भाव रहे इदन्नमम्
करें यज्ञ सदा
प्रभु जैसी तेरी
नियमित सृष्टि
निष्काम कर्म की
कर दो वृष्टि
स्वार्थी ना हो
हों परमार्थी
यज्ञ के भाव रहे इदन्नमम्
करें यज्ञ सदा
क्यों मनमानी करें
सन्मार्ग क्यों ना चले
यज्ञ के भाव रहे इदन्नमम्
करें यज्ञ सदा










