भक्ति
क्या लेकर आया जग में,
क्या लेकर चले जाओगे।
प्रभु सिमरन और धन कर्मों का
नरजीवन में ही पाओगे।।1।।
कुटुम्ब, कबीला, सोना, बंगला
साथ न तेरे जायेंगे।
इनकी खातिर पाप क्यों करता
यश ना तुझे दिलायेंगे।।2।।
समय गँवाया खान पान में
जग के जाल में जकड़ा सब।
परमानन्द के पान का वक्त
मिलेगा तुझको कब कब ।।3।।
काम क्रोध को दिया बढ़ावा
परहित धर्म कमाया ना।
इस कारण नर जीवन पाकर
सच्चे सुख को पाया ना।।4।।
कुछ नहीं बिगड़ा संभल जा
अब भी नेक कमाई कर ले तू।
प्रभु सिमर मन उज्ज्वल कर ले,
सब से प्रीति कर ले तू ।।5।।
झूठी खुशी विषयों में पायी,
आनन्द लिया न भक्ति में,
प्रभु नाम जपा ना मानव,
व्यर्थ जिया इस जगती में।।6।।










