क्या खोया क्या पाया

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क्या खोया क्या पाया

क्या खोया क्या पाया
जग में क्या खोया क्या पाया।
हाथ बढ़ाया पुष्पलता को
कंटक ने डस खाया ॥

मानवदेह मिली दुर्लभ है
कश्यप क्यों भरमाया।
ओ३म् भक्ति बिनु सार
नहीं है वेदों ने बतलाया।
जग में……….।

सुन्दर कोमल गात देखकर
नर फूला नहीं समाया।
जरा व्याधि वेग लगा
तब बह गई सुन्दर काया ।
जग में…….।

सुख के सपने रैन में
देखे जागे कष्ट उठाया।
मृग-मरीचिकासम हम
भागे माया ने भरमाया ॥
जग में……….।

सुख के खातिर उड़े
वायु में गगन में भवन बनाया।
टूटे पंख गिरे पृथ्वी पर
मिले न सुख की छाया ॥
जग में………..।

मूर्ख मन चंचल नहीं माने
बार-बार समझाया।
इस असार संसार में रहके
कह किसने सुख पाया।
जग में……….।