क्या कहिये ऐसे लोगों को मैल चढ़ा जिनके मन पर।
क्या कहिये ऐसे लोगों को
मैल चढ़ा जिनके मन पर।
अपने चेहरे साफ नहीं हैं
दोष लगा रहे दर्पण पर॥ टेक ॥
ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश का
दर्पण बना दिया।
जैसा भी जिसका चेहरा था
वैसा उसको दिखा दिया॥
किया नहीं समझोता पाखंड
अन्ध-विश्वास के खण्डन पर॥1॥
कपटी वेषधारियों के
दल पोल खुली तो घबराये।
दर्पण में सत्यार्थ के
सबको अपने रूप नजर आये॥
जायें तो अब जायें कहां
जब कपट का बाणा है तन पर ॥2॥
महाभारत पश्चात वेद के
ज्ञान का बन्द हुआ दरवाजा।
मत मजहब पन्थों का
धीरे-धीरे बजने लगा बाजा॥
जनाजा सच का निकला,
झूठ का पड़ग्या साया
जन-जन पर॥3॥
कल्पित ग्रन्थ रचे पीपल पर
झोल चढ़ाये कञ्चन के।
भ्रम में भटके लोग यहां
पर दास बने पागलपन के॥
बनके (गुरु) धूर्त्त पुजने लगे
बैठ के ऊंचे आसन पर॥4॥
सत्य युक्तियाँ प्रमाणों से
सबकी बन्द हुई आवाज ।
विधवा दीन अनाथों की
रक्षा को खड़ा हुआ आर्यसमाज॥
लाज धर्म की बचाने के लिए
उतर गया आन्दोलन पर॥5॥
ऋषि के भक्तों आज कमी
क्या अपने जीवन को देखो।
कभी-कभी तो अपना
चेहरा सच के दर्पण में देखो॥
फेंको स्वार्थ का चौगा उतार के
‘कर्मठ’ बदलो आचरण पर॥6॥










