कोई बचा है न कोई बचेगा, मृत्युरूपी देह विनाश से।

0
40

कोई बचा है न कोई बचेगा, मृत्युरूपी देह विनाश से।

कोई बचा है न कोई बचेगा,
मृत्युरूपी देह विनाश से।
राजा हो या रंक हो,
सम्बन्ध होगा जलती लाश से। ।।1।।

जन्म लिया जो इस भूमंडल में,
मरना उसका अनिवार्य है।
राजवैद्य हो या सर्जन हो,
मृत्यु का रोग अपरिहार्य है।।2।।

बाल वृद्ध युवा न देखता,
काल सभी को निगलता है।
अमीर-गरीब नहीं जानता,
महाकाल सबको मसलता है।।3।।

ज्ञानी-मूर्ख स्त्री-पुरुष सभी को,
यमालय एक दिन जाना है।
पत्रस्थ पानी की बूँद जैसे,
वृक्ष के नीचे कभी भी गिरती है।
स्थान समय कुछ भी निश्चित नहीं,
मृत्यु अवश्य आना है।।4।।

शरीर में स्थित प्राणवायु को कैसे,
मृत्यु कभी भी हरती है।
सदा जीवित रहूँ संसार में,
विचार करता है यह मानवः।।5।।

जबकि टूट पड़ सकता है
कभी भी मौत का दुर्दानव ।।6।।

बुलबुले के समान यह जीवन है,
नहीं कोई भरोसा।
जिसे देखा आज मंडप में,
श्मशान में उसे कल देखा।।7।।

कल रहेगा अथवा नहीं
शरीर का न कोई विश्वास।
फिर भी सदा जीवित ही रहूँ,
करता है नर आस।।8।।

पके हुए फल को सदा,
वृक्ष में न कोई रोक सकता है।
वृद्ध न होवे नष्ट न होवे,
शरीर की नहीं यह क्षमता है।।9।।

संसार में मग्न मानव मत भूल,
मृत्यु अवश्यम्भावी है।
पाप अधर्म का त्याग कर दे,
अंत में यह दुःखदायी है।।10।।

वृद्धावस्था दुःख रोग की शय्या,
मृत्यु की याद दिलाती है।
अविद्याग्रस्त मानव जीवन में,
अध्यात्म ज्योति जलाती है।।11।।

एक ईश्वर की भक्ति ही,
जन्म-मरण से छुड़ाती है।
प्यारे प्रभु को जान लेने पर,
मृत्यु भय न सताती है।।12।।