खंजर से उड़ा दो चाहे मेरी बोटी बोटी को।

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खंजर से उड़ा दो चाहे मेरी बोटी बोटी को।

खंजर से उड़ा दो चाहे
मेरी बोटी बोटी को।

पर दूंगा नहीं चोटी को
मैं दंगा नहीं चोटी को।

शीश काट सकते हो लो
काट श्रीमान् मेरा।
डिगा नहीं सकते
कभी धर्म से तुम ध्यान मेरा।
बलिदान मेरा पहुंचाएगा
‘वीर’ उच्च कोटि को।

सबसे प्यारी चीज देखो
हर किसी की जान है।
इस चोटी के लिए मगर
जान भी कुर्बान है।
पहिचान है मुझे मैं सब
समझें खरी खोटी को।

चोटी के बदले में लूं
ना दुनियां की जागीर मैं।
बांध नहीं सकते तुम
मुझको जर की जंजीर में।
फकीर ना मैं अतना चोटी
देके चाहूँ रोटी को।

समझाया हकीकत
जो कि हकीकत ही नाम है।
काट दो हकीकत को
तुम बस का नहीं काम है।
खाम है ख्याल जरा
परख ले कसौटी को।

गर्दन के उतरने पर ही
उतरेगा यज्ञोपवीत।
क्योंकि ये हमारी आर्यों
की है पुरानी रीत।
भयभीत करना चाहते हो
तुम समझ आयु छोटी को।