केचिद वदन्ति धनहीन जनो जघन्य: ।

0
18

केचिद वदन्ति धनहीन जनो जघन्य: ।

केचिद वदन्ति धनहीन जनो जघन्य: ।
केचिद वदन्ति गुणहीन जनो जघन्य: ॥
व्यासो वदत्यखिल शास्त्र विदाम् वरेण्य:।
नारायण $ स्मरणहीन जनो जघन्य: ॥ (1)

ओ३म् नाम, मधुर नाम, गाये जा रे
प्राणी बोल के, रस घोल के
मस्ती में गा ले, प्रीति लगा
अनमोल जीवन, सफल बना ले
ओ३म् नाम, मधुर नाम, गाये जा रे
प्राणी बोल के, रस घोल के

जिसके जप से, बुद्धि विमल हो जाती है
शंकाएँ निर्मूल – सकल हो जाती हैं
प्रतिपल पल आनन्द आंतरिक होता है
जिसके जप से मन अति हर्षित होता है
उसको माना ले, प्रीति लगा ले
अनमोल जीवन, सफल बना ले
ओ३म् नाम, मधुर नाम, गाये जा रे
प्राणी बोल के, रस घोल के

जो अनुपम-ब्रह्माण्ड की रचना करता है
जो प्रियतम प्राणेश, दुखों को हरता है
देश-भक्त, प्रभु-भक्त ही जिसको प्यारा है
दुर्बल-दुखिया-दीन का एक सहारा है
उसको माना ले, प्रीति लगा ले
अनमोल जीवन, सफल बना ले
ओ३म् नाम, मधुर नाम, गाये जा रे
प्राणी बोल के, रस घोल के

जिससे जग-मग ज्योतिमान नभ-मण्डल है
जो अनुपम-आनन्द, निष्कपट-निश्चल है
यथा-योग्य कर्मो का, जो देता फल है
निराकार-निर्लेप, निरंजन-निर्मल है
उसको माना ले, प्रीति लगा ले
अनमोल जीवन, सफल बना ले
ओ३म् नाम, मधुर नाम, गाये जा रे
प्राणी बोल के, रस घोल के

इधर-उधर दर-बदर भटकता क्यों नर है
अणु-अणु में कण-कण में व्यापक ईश्वर है
“बेगराज” हर एक दिल में प्रभु का घर है
फिर किसका डर जब रक्षक जगदीश्वर है
उसको ही ध्या ले, प्रीति लगा ले
अनमोल जीवन, सफल बना ले
ओ३म् नाम, मधुर नाम, गाये जा रे
प्राणी बोल के, रस घोल के
प्राणी बोल के, रस घोल के
प्राणी बोल के, रस घोल के
प्राणी बोल के, रस घोल के

ओ३म् यो भू॒तं च॒ भव्यं॑ च॒ सर्वं॒ यश्चा॑धि॒तिष्ठ॑ति।
स्वर्यस्य॑ च॒ केव॑लं॒ तस्मै॑ ज्ये॒ष्ठाय॒ ब्रह्म॑णे॒ नमः॑ ॥
अथर्ववेद 10/8/1

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री बेगराज जी आर्य भजन उपदेशक