काटकर रोज जीवों को,खाते रहे, दिल लुभाते रहे
तर्ज – जिसके सपने हमें…….
काटकर रोज जीवों को,
खाते रहे, दिल लुभाते रहे
ये बता दो, बता दो,
ये बता दो अरे क्या ये ही धर्म है……
ये ही धर्म है
पाप-पुण्य कभी भी,
विचारा नहीं दुष्कर्मों के आगे भी,
हारा नहीं पाप करके, “सचिन”,
मुसकुराते रहे, इतराते रहे
ये बता दो………..
जब भी दिल को किसी के,
दुखायेंगे हम दिल रैना दुःखी ही,
बतायेंगे हम खून जीवों का,
निसदिन, बहाते रहे,
उन्हें खाते रहे ये बता दो……
न्यायकारी विधाता वो,
देगा रे फल फल मिलके रहेगा,
आज या कल ज़िन्दगी को,
हवा में, उड़ाते रहे, लहराते रहे
ये बता दो……










