कारूणिक जन क्रूर होते जा रहे

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कारूणिक जन क्रूर होते जा रहे

कारूणिक जन क्रूर होते जा रहे,
मानवता से दूर होते जा रहे ।।

सुखियों से मैत्री व दुखियों पै दया,
यह नियम काफूर होते जा रहे ।।1।।

भंवर में नैया खिवैया छोड़कर,
खुद नशे में चूर होते जा रहे।।2।।

निर्दोषी को दण्ड, दोषी को क्या
गजब दस्तूर होते जा इनाम, रहे ।।3।।

देश द्रोही निर्दयी अय्यास सन्तों में
मशहूर होते जा जन, रहे।।4।।

प्रसन्नता से सम्मिलित कव्वों में वह,
देखो रे मयूर होते जा रहे।।5।।

देखने को देश की बर्बादियां,
आज हम मजबूर होते जा रहे।।6।।

डूबने को प्रेमी जीवन के घड़े,
पापों से भरपूर होते जा रहे ।।7।।