करनी करे तो क्यूँ करे

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करनी करे तो क्यूँ करे

करनी करे तो क्यूँ करे
क्यूँ कर के पछताये
बोया पेड़ बबूल का
तो आम कहाँ से पाये

ऋषि मुनि साधु संन्यासी
कह रहे ज्ञानी हमारे
कर्म फल न्यारे न्यारे

एक पिता के दो बेटे हैं
दोनों उसको प्यारे
इक माँ की गोदी में खेले
दोनों सुभट दुलारे
इक गद्दी पर – इक गलियों में
फिरता हाथ पसारे
कर्म फल न्यारे न्यारे

एक के घर छाया करते
सूरज चाँद सितारे
हीरे मोती लाल जवाहर
सुख के साधन सारे
एक के बालक/बच्चे फिर भटकते
दो रोटी के मारे
कर्म फल न्यारे न्यारे

एक के घर डोली से उतरी
दुलहन अंग सँवारे
एक के घर उठा जनाजा
हा हा कार पुकारे
समझ सका “बेमोल” न अब तक
तेरे अजब नजारे
कर्म फल न्यारे न्यारे

एक के घर पर खेल रहे हैं
बच्चों के लंगारे
खाने पीने की वस्तु के
भरे हुए भण्डारे
एक के बालक फिर भटकते
दो रोटी के मारे
कर्म फल न्यारे न्यारे