कर कुछ नेकी
कर कुछ नेकी पास
प्रभु के जाने के लिए।
आया नहीं है खाने
और मर जाने के लिए।
चार दिनों का है यह उजाला
रात अंधेरी आये फिर।
इस पर इतना मान न
कर कर तू आकर ये जाये फिर।
महल बना है माटी का
गिर जाने के लिए।
मस्त हुआ दुनियां में ऐसा
मौत को पगले भूल गया।
धन दौलत ये साथ ने देंगे
जिन पर इतना फूल गया।
फूल खिला है जवानी का
मुरझाने के लिए।
दुनियां के विषयों में
पड़कर जीवन को बर्बाद न कर।
समय मिला अनमोल यह
मोहन अन्त को तू फरियाद न कर।
आया है दुनिया में, कुछ
कर जाने के लिए।
अपनी ही तकदीर का
खाता है हर कोई बशर ।
चाहे खाये अपने घर,
चाहे खाये तेरे घर ॥










