कण कण में बसा प्रभु देख रहा

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कण कण में बसा प्रभु देख रहा

कण कण में बसा प्रभु देख रहा,
चाहे पाप करो चाहे पुण्य करो।

कोई उसकी नजर से बच न सका,
चाहे पाप करो चाहे पुण्य करो।

यह जगत रचा उस ईश्वर ने.
जीवों के कर्म करने के लिये।
यह आवागमन का चक्र चला,
चाहे पाप करो चाहे पुण्य करो ।।

इंसान शुभ-अशुभ कर्म करे,
अधिकार मिला है जमाने में।
कर्मों से स्वतन्त्र बना है मगर,
परतन्त्र सदा फल पाने में।

है न्याय प्रभु का बहुत बड़ा,
चाहे पाप करो चाहे पुण्य करो ।।

सब पुण्य का फल तो चाहते हैं,
पर पुण्य कर्म नहीं करते हैं।
फल पाप का लोग नहीं चाहते,
जिसमें दिन रात विचरते हैं।
मिलता है सबको अपना किया,
चाहे पाप करो चाहे पुण्य करो ।।

इस दुनियां में कृत कर्मों का.
फल हरगिज माफ नहीं होता।
जब तक न यहां भुगतान करें,
यह दामन साफ नहीं होता।
रहे याद नियम ये पथिक सदा,
चाहे पाप करो चाहे पुण्य करो ।।