काम क्रोध, मद लोभ,मोह जीवन का नाश करें हैं।

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काम क्रोध, मद लोभ,मोह जीवन का नाश करें हैं।

काम क्रोध, मद लोभ
मोह जीवन का नाश करें हैं।
नहीं बचाये से बचते
जिसमे ये वास करें हैं।।

काम के वशीभूत कामी को
ना रहती है लाज शर्म,
उचित अनुचित सत्य और
मिथ्या श्रेय और प्रेय
शुभ अशुभ कर्म ।।

बिन विवेक बिन मनन शीलता
क्या जाने कामान्ध धर्म,
धीरता वीरता साहस के
बिन कामी का संदिग्ध मर्म।
कामी पुरूषों की निन्दा
पढ़ लो इतिहास करे है।।1।।

क्रोध भयंकर रूप धार करके
जिस पर आता है।
बुद्धि और विवेक शीलता
को चट कर जाता है।

सरस सौम्यता ओज कभी
नहीं क्रोधी नर पाता हैं,
औरों को भी नष्ट करे
खुद क्रोध में मर जाता है।
क्रोध के फंदे कोधी के
गुम होश हवास करे है।।2।।।

मद में अंधा हुआ मनुष्य
नहीं धर्म कर्म भक्ति जाने,
क्या करना क्या नहीं करना है
हानि लाभ नहीं पहचाने।

हर समय बुद्धि भ्रष्ट रहें
कोई लाख कहे एक नहीं माने,
मानवता से भटका हुआ
मद मस्त करे जो भी ठाने।
अशिष्ट असभ्य कुपथ गामी,
दन्द्रियों का दास करे है।।3।।

महाभारत का युद्ध भयकर
मोह का ही परिणाम हुआ,
जिसके बराबर नहीं विश्व में
पारिवारिक संग्राम हुआ।
भाईयो के हाथों से ही
भाईयों का कत्ले आम हुआ।।

कुल का नाश हुआ और
भारत दुनिया में बदनाम हुआ।
मोह में फंसे हुए नर निष्फल
सुख की आस करें हैं।।4।।

सारे पापों का कारण ही
लोभ को बतलाते हैं।
दया धर्म सत्य न्याय प्रेम नहीं
लोभी नर पाते हैं,
सखा स्नेही रिश्वेदार लोभी
से घबराते हैं।

लोभ के वशी भूत हो
लोभी अन्त में पछताते हैं।
इन पांचों से बचने का
प्रेमी प्रयास करें हैं ।।5।।

वेद ही ईश्वरीय ज्ञान है जैसा परमेश्वर है
और जैसा कम रखा है, वैसा ही ईश्वर,
सृष्टिकृम, कार्य कारण, और जीव का
प्रतिपादन जिसमें होवे वह परमेश्वरोक्त
पुस्तक होता है इसप्रकार के वेद है

– (सत्यार्थप्रकाश)