काले काले बादल उमड़े

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काले काले बादल उमड़े

काले काले बादल उमड़े
शक्तिधर बने हरे पर्वत
जैसे पर्वत पर दौड़े पर्वत
प्रभु लीला देख रहे सर्वत्
काले काले बादल उमड़े

प्रभु सूखा काठ में अब ना रहा
अनुग्रह-भार की शाखा हूँ
जब आपकी गौरव-कृपा झुकी
पिघला हूँ, खुद को झुकाता हूँ
पर्वत की अनघड़ शक्ति थी
मस्त झूमता हाथी था घन पर
काले काले बादल उमड़े

जीवन का बल तो सिंह में था
चीते में था चील-बाज़ में था
सुसंस्कृत बल तो सन्त में था
रस-भरा स्नेह उस हृदय में था
जीवन संजीवनी शक्ति बन
प्रभु-भक्त हृदय में आया अकत
काले काले बादल उमड़े

पर्वत और बादल का मधुनाद
झंकृत हो उठा हृदय-तंत्री से मेरी
अजपा जप तब ही तो जपे
तव त्वरित उठे अनाहत ध्वनि
हे विश्वगीत के चतुर गायक !
मेरे हृदय की बंसी बजाओ सहज
काले काले बादल उमड़े
शक्तिधर बने हरे पर्वत
जैसे पर्वत पर दौड़े पर्वत
प्रभु लीला देख रहे सर्वत्
काले काले बादल उमड़े