कैसे अमूरत की मूर्ति बनावें।
कैसे अमूरत की मूर्ति बनावें।
सर्व देशी को एक देशी ठहरावें ।।1।।
आवाहन करें तो कहाँ से बुलावें।
विसर्जन करें तो कहाँ को पठावें।।2।।
आसन सिंहासन पे तकिया लगावें।
निराकार को किसके आश्रय बिठावें।।3।।
अचेतन में प्राण-प्रतिष्ठा करावें।
जड़ वस्तु को कैसे चेतन बनावें।।4।।
पाद्यार्घ आचमन किसको करावें।
सदा शुद्ध निर्मल को किसमें निहलावें।।5।।
धूपादि गंधादि क्यों कर सुँघावें।
निर्लेप को लेप कैसे लगावें।।6।।
ज्योति प्रदीपक को दीपक दिखावें।
सूर्य को जुगनू का चाँद बतावें ।।7।।
नैवेद्य के पीछे शुद्ध जल चढ़ावें।
क्षुधा को मिटाकर तृषा को मिटावें ।।8।।
पान और सुपारी इलायची मिलायें।
यह क्या उनके होठों की रंगत बढ़ावें।।9।।
धनधान्य जिसका है सर्वस्व जिसका।
टका दक्षिणा देके बदला चुकावें।।10।।
प्रदक्षिण में जिसका नहीं अन्त पायें।
फिरें गिर्द उसके सिर्फ चक्र खावें।।11।।
जो जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति से न्यारा।
किसको जगावें व किसको सुलावें ।।12।।
अजन्मा को जो आम जन्मा बतायें।
‘अमीचन्द’ क्यों उनके धोखे में आवें।।13।।
जरूरी नहीं कि हर वक्त,
लबों पर खुदा का नाम आये।
वो लम्हा भी इबादत का होता है,
जब इन्सान किसी के काम आये।।14।।










