कैसा जग का रवैया हुआ
कैसा जग का रवैया हुआ,
जीवन का लक्ष्य रुपैया हुआ।
स्वार्थ की आंधिया चल रहीं,
शत्रु भैया का भैया हुआ ।।1।।
बाड़ ही खेत खाने लगी,
प्राण घातक बच्चैया हुआ।।2।।
भंवर में नाद को छोड़कर,
रफु चक्कर खिवैया हुआ ।।३।।
वेद शास्त्रों की जहां थी कथा,
थाथक भैया कथैया हुआ।।4।।
दशा देखो तो नौजवान की,
शादियों में नचैया हुआ।।5।।
चेलियां बन गई गोपियां,
गुरु नाचे कन्हैय हुआ।।6।।
जिसको सरगम भी आती नहीं,
वह प्रेमी गवैया हुआ।।7।।










