वर्यः सुपर्णा उप॑ सदुरिन्द्रं प्रियमे॑वा॒ ऋषयो नाधमानाः ।
अप॑ ध्वान्तमृणुहि पूर्धि चक्षुर्मुमुग्ध्य१स्मिन्त्रधर्येव वद्धान्॥ ऋ. १०.८३.११
तर्जः प्रणय सन्गन्ती तिंगळ इदि विरन्य कालम
दृष्टि दे दो हे आत्मन् ! दर्शनशक्ति आ जाए,
तम का उठा दो परदा, सूक्ष्म दृष्टि पा जाएँ,
बन्धन हमारे तुम काटो, सुप्रकाश अपना हमें बाँटो
तव इन्द्र शरण पा जाएँ। ॥ दृष्टि दे दो हे आत्मन्॥
(1) पाँच इन्द्रियाँ ज्ञान की सबके शरीर में रहती हैं।
पंछियों के जैसे इत उत बस उड़ती फिरती रहती हैं।
पाँच-विषय के रसों में उलझी,
तृष्णा हमारी पलपल और बढ़ाये ॥ ॥ दृष्टि दे दो हे आत्मन् ॥
कान जीभ आँखें जब खोलें, जगत विविध दिख जाए
ऐसा जादू करे, हम पे इन्द्रियाँ हमें भरमायें।
तृप्त कर सकें कभी ना हमको,
मार्ग में देखो खड़ी हैं लाखों तृष्णायें॥ ॥ दृष्टि दे दो हे आत्मन् ॥
पाँच इन्द्रियाँ बाह्य प्रकाश से तृप्त ना कभी कर पाये।
इन्द्रिय छटी इसी मन द्वारा प्रत्याहार की ज्योत जगाये
उड़ना इन्द्रियों का थम जाए
परिमितता अन्धकार की मिटती जाए॥ ॥ दृष्टि दे दो हे आत्मन् ॥
देख सके ना अतिसूक्ष्म या अतिदूर ये आँखें
यही इन्द्र आत्मन् जाने शुद्ध ज्ञान प्रकाश की बातें
इसीलिए इन्द्रियाँ इस आत्मा से
उस प्रकाश के लिए ही गिड़गिड़ाये ॥ ॥ दृष्टि दे दो हे आत्मन् ॥
देशकालाव्यवहित दर्शन की शक्ति हममें जगा दो।
हे आत्मदेव ! हे इन्द्र सुप्रकाश का मार्ग सुझा दो।
तुझ बिन और कहाँ जाएँ हम,
छाये हुए यहाँ विषय-विषों के साये ॥ ॥ दृष्टि दे दो हे आत्मन् ॥
(परिमितता) यथार्थ परमाण, नपातुला। (अव्यवहित) व्यवधान रहित। (सुझाना) दिखलाना।










