कहाँ भगवान ? किसने उसे देखा?

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प्रसुस्तोमं भरत वाजयन्तं इन्द्राय सत्यं यदि सत्यमस्ति नेन्द्रौ

अस्तीति नेम उत्व आहं कई ददर्श कमभिष्ट वाम ॥3॥

अयमस्मि जरितः पश्य मेह विश्वा जतान्यभ्यस्मि महा ।

ऋतस्य मा प्रदिशो वर्धयन्त्या दर्दि भुव॑ना दर्दरीमि ॥4॥ ऋ. ८.१००.३/४

तर्जः मुडिगलुम मौनम गळम मिडिगळम

स्तुति करो वाचाल मन, होवे स्तुति हृदयंगम
खोजूँ कहाँ तुम्हें भगवन्, जानूँ हृदय में देते दर्शन
किसने कहा तुम हो नहीं? फिर सृष्टि ये किसने रची?
क्यों हुआ संशय ? हुई सोच विलय
हुआ चित्त चञ्चल, पूजा हुई विफल
आखिर कहो भ्रम में है कौन? विश्वास क्यों है विलोम ?
॥स्तुति करो॥…

तेरी स्तुति से तो, परमेश्वर को कोई भी स्वार्थी नहीं
अन्तस्तल से निकली हुई स्तुतियों से भक्त हुआ है सुधी
भक्तों की श्रद्धाभक्ति दूर करे, संशय प्रमाद अविरति
कहता है अन्दर बैठा प्यारा प्रभु, ऐ भक्त तेरे अन्दर मैं ही हूँ
प्यारे प्रभु को क्यों ना भजें? क्यों ना हृदय में, दर्शन करें?
चित्त की चञ्चलता को त्याग दें, योग साधनों से प्रीति करें।
॥ स्तुति करो॥…

ईश्वर का चिन्तन स्मरण और ध्यान, मूर्ख चाहे ना करे,
किन्तु जो हैं ऋतगामी, ज्ञानी, सुधी, योग में उसके रहें
वास्तव में सभी ईशोत्पादक शक्तियाँ दिखती कभी प्रत्यक्ष नहीं
उसकी पालन शक्ति भी व्यक्त नहीं।
इसका अनुमान ज्ञानी ही करते सही।
प्रभु चाहें तो प्रलय करें
लौकिक संसार को नष्ट करें
इस संहार में छिपा प्यार दिखे
सच्चे भक्त ही समझा करें।
॥ स्तुति करो॥…


(हृदयंगम) हृदय में समाहित। (अविरति) विषयों की आसक्ति। (विफल) व्यर्थ।
(सुधी) बुद्धिमान। (ऋगगामी) नियमों पर चलने वाला। (विलोम) उलटा।