काबू में अपना मन न हो, तो ध्यान क्या करे?
काबू में अपना मन न हो,
तो ध्यान क्या करे ?
होश हवाश गुम हो तो,
फिर ज्ञान क्या करे
कुछ लोग कहते धर्म
और ईमान कुछ नहीं
ऐ माल हो खराब तो
ईमान क्या करे (1)
होश हवाश गुम हो तो,
फिर ज्ञान क्या करे
काबू में अपना मन न हो,
तो ध्यान क्या करे ?
दीदार अपने भक्तों को
देता है ईश्वर
बन्दा करे न ध्यान तो
भगवान् क्या करे (2)
होश हवाश गुम हो तो,
फिर ज्ञान क्या करे
काबू में अपना मन न हो,
तो ध्यान क्या करे ?
पैसे को समझता है
जो मक़्सद-ए-हयात
वह रूह के सुकून का
सामान क्या करे (3)
होश हवाश गुम हो तो,
फिर ज्ञान क्या करे
काबू में अपना मन न हो,
तो ध्यान क्या करे ?
जिस घर के वालिदैन
हों अय्याश “नत्थासिंह”
उस घर की बेहतरी भला
सन्तान क्या करे (4)
होश हवाश गुम हो तो,
फिर ज्ञान क्या करे
काबू में अपना मन न हो,
तो ध्यान क्या करे ?
होश हवाश गुम हो तो,
फिर ज्ञान क्या करे
काबू में अपना मन न हो,
तो ध्यान क्या करे ? (5)
रचनाकार :- श्री चौधरी नत्थासिंह जी
साभार :- अमर गीतांजलि, प्रकाशक :- अमर स्वामी प्रकाशन विभाग गाजियाबाद उत्तर प्रदेश लाजपत राय जी आर्य भाग 4, भजन संख्या 24 , पृष्ठ संख्या 33-34
मक़्सद-ए-हयात = जीवन का उद्देश्य
बेहतरी = भलाई
वालिदैन = माँ–बाप, माता–पिता
ईमान क्या करे (1) :- प्रस्तुत भजन में ईमान का अर्थ प्रचलित शब्द कोशों में बतलाए अनुसार विश्वास या भरोसा लेना होगा अन्यथा ईमान शब्द का अर्थ होता है अल्लाह, मोहम्मद, कुरआन पर विश्वास लाने वाला लेकिन इस भजन के रचनाकार ने अधिकांश शब्द उर्दू के लिए हैं तो यहाँ अर्थ प्रचलित ही होगा | उल्लेखनीय है की ईमानदार और प्रामाणिक पर्यायवाची होते हुए भी समान-अर्थ नहीं रखते | इस्लाम को अधिक समझने के लिए सत्यार्थ प्रकाश के 14वें समुल्लास को पढ़ें और जानें | धन्यवाद










