कभी भी किसी को सताना नहीं (धुन-परदेसी परदेसी जाना नहीं)
कभी भी किसी को सताना नहीं,
परम धर्म है, श्रेष्ठ कर्म है।
जीव जन्तु सारे ईश्वर के प्यारे,
इनको क्यों मारे,
सच्चे साथी ये तुम्हारे। टैक ।
अच्छे बुरे कर्म फल के संयोगों में,
न्याय व्यवस्था से सब भिन्न-भिन्न चोगो में,
परमेश्वर की कृपा से उद्योगों में,
मस्ती से निज कर्म भोग रहे भोगों में।
जीव जन्तु सारे ईश्वर के प्यारे,
इनको क्यों मारे सच्चे साथी ये तुम्हारे । ।। ।।
मनन शीलता से मानव की जात हो तुम,
योनियों में अशरफुल्ल मखलुकात हो तुम।
सर्व श्रेष्ठ साधन सम्पन्न हे भ्रात हो तुम,
सृष्टि रक्षक ईश्वर के पश्चात हो तुम
कभी ना विचारे जीवन……….।।2
प्रवृत्ति जब अविरति में बट जाती है,
तब मानव की मानवता घट जाती है।
दयालुता जब हृदय से हट जाती है,
प्रभु के सम्बन्ध की डोरी कट जाती है
अरे ओ हत्यारे जीव…….
छोटो को दो प्यार बड़ो को आदर दो,
मित्र भाव से समझो सदा बराबर को।
कण-कण में देखो प्रेमी परमेश्वर को,
अहिंसा पालन सिखला दो नारी नर को ।।
कर्तव्य तुम्हारे जीव……………।।4।।
शुभ गुण धारणा हेतु प्रभु यश।
श्रवण और उपदेश करो।।
प्राणायाम योग से तन के।
रोग सभी अवशेष करो ।।










