कभी धूप आए कभी छाँव आए

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कभी धूप आए कभी छाँव आए

तर्ज : लुटी जिन्दगी और ग़म मुस्कराए

विशाल नभ में तेरे लाखों चिराग जलते हैं

तेरी ही ज्योति को पा के प्रकाश करते हैं ॥

कभी धूप आए कभी छाँव आए

जीवन भी ऐसे चलता ही जाए ॥ कभी धूप…

कभी है ये जीवन काँटों के बस में

कभी फूल बनके घुले रंग रस में

प्रभु ने ही कर्मों के खेल खिलाए ॥ जीवन भी…

जो बाँटे उसे झोली भर भर के देता

जो संचित करे खुद को दुःखी कर लेता

कर्म ही हँसाये कर्म ही रुलाये ॥ जीवन भी…

जनम चक्र में जीव चलता ही रहता

कई योनियों में भटकता ही रहता

जनम मरण से छूट ना पाए

दयालु कृपालु तू अन्तर्यामी,

पाएँ तुझे साधु सन्त और ज्ञानी

जो तुझमें समाए वही तुझको पाए

जीवन के जाल से तभी छूट पाए ॥ कभी धूप…