कब तक देखोगे,कब तक देखोगे (धुन-मैं ना भूलूंगा, मैं ना भूलुंगा)
कब तक देखोगे,
कब तक देखोगे,
इस हालत को,
इस जहालत को
बढ़ते उत्पातों को।
कब तक देखोगे.. ।। टेक ।।
समय की धारा मैं बहे जाते हो।
जुल्मो पर जुल्मों को सहे जाते हो।
पाप जुल्म करना है
महापाप जुल्म का सहना।
इन दुर्दिन काली रातों को
कब तक देखोगे ।।1।।
संभ्यता संस्कृति लुटी जाती है।
पीड़ित धार्मिक जनता घुटी जाती है।
निर्दयिता से लूट रहे हैं
यहां मजहबी लुटेरे।
क्रूर घातकों के घातों को
कब तक देखोगे ।।2।।
जमाना कहता है
यह दुनिया उसकी है।
संगठन की शक्ति जहां
पर जिसकी है।।
ऊंच नीच और घृणा द्वेष
जाति फिरको की बुराई।
बढते गन्दे हालातो को
कब तक देखोगे ।।3।।
यह दूषित वातावरण
समाज बदल डालो।
कल व परसों में नहीं
आज बदल डालो।
मनुष्य जाति है एक वर्ग
दो आर्य और दस्यु हैं।
प्रेमी इन अनगिन जातो
को कब तक देखोगे।।4।।
वैदिक वर्ण व्यवस्था
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शुद्र जन्म से नहीं कर्म अनुसार शिक्षक रक्षक पोषक सेवक मनुष्य समाज मे श्रेणी चार विद्यावबल और बाहुबल धनबल जनबल के आधार इज्जत हकूमत दौलत मेहनत समझें जन्म सिद्ध अधिकार जब तक वैदिक मान्यताओं की उपेक्षा करते जाओगे तक तक जीवन यात्रा का आनन्द नही ले पाओगे










