ज्यों-ज्यों करे सुधार त्यों त्यों हो रहा बिगाड़ ही।
ज्यों-ज्यों करे सुधार
त्यों त्यों हो रहा बिगाड़ ही।
करी थी रक्षार्थ खेत
खा रही है बाड़ ही।।
बना कर के योजनायें
सफलता की आश की।
लेकिन सब स्कीम बदली
शक्ल में विनाश की ।।
फुलवाड़ी तो पास की
बोये गये झाड़ ही ।।1।।
जातियों के नाम पर यहां
जितने भी स्कूल हैं।
एकता की राह में इन्हें
समझों तिक्ष्ण शूल हैं।।
समय के प्रतिकूल हैं
बढ़ाते हैं राड़ ही ।।2।।
इच्छा मधु की हाथ है
भिरड़ो के छत्तों पर।
लग रही है आग जड़ में
पानी छिड़के पत्तों पर ।।
लानत है उन्मत्तों पर
तुड़ा रहे नाड़ ही।।3।।
प्रेमी वैदिक धर्म ऊपर
जब तक ना होगा विश्वास।
तब तक एकता का होना
बांझ से बच्चे की आस।
कहावत है दिल्ली खास
रहकर झोंका भाड़ ही।।4।।










