जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित

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जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित

जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?
जिसमें है सद्गुण शील नहीं
उसको इन्सान कहूँ कैसे ?
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित

है अजर अमर वो अविनाशी
अद्भुत जिसने सन्सार रचा
जो जन्म-मरण के बन्धन में
उसको भगवान् कहूँ कैसे
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?

सन्तान वहीं जो मात-पिता
का यश फैलाये जगती में
कुल को अपयश मिलता जिससे
उसको सन्तान कहूँ कैसे ?
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?

जिन सम्बन्धों में उज्जवलता
और मर्यादा न रह पाये
उन सम्बन्धों को रक्षा की
पावन पहचान कहूँ कैसे
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?

बिन अन्न – जहाँ भूखी जनता
निशदिन तिल-तिल कर मरती हो
उसको विकास उन्नतिशील
या देश महान् कहूँ कैसे ?
जिसमें है सद्गुण शील नहीं
उसको इन्सान कहूँ कैसे ?

वृद्धों का हो अपमान जहाँ
नारी की अस्मत लुटती हो
दिन रात भ्रूण हत्याएँ हों
उसको उत्थान कहूँ कैसे
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?

पग-पग पर भ्रष्टाचार जहाँ
बाजार गरम हैं रिश्वत का
उस घोर अराजक शासन को
मैं स्वर्ग समान कहूँ कैसे ?
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?

हैं मधुर-धनी ये जन जिनके
मन में हर दम सन्तोष रहे
तृष्णा की आग लगी जिनमें
उनको धनवान् कहूँ कैसे
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?
जिसमें है सद्गुण शील नहीं
उसको इन्सान कहूँ कैसे ?
जो सुन्दर सुरभित सुमन रहित
उसको उद्यान कहूँ कैसे ?

स्वर :- श्री पण्डित योगेश दत्त जी आर्य