जो निर्धन श्रम ना करे
जो निर्धन श्रम ना करे
धनी करे नहीं दान,
भारी पत्थर बांध कर
फेंको जल दरम्यान ।
धन साधन है साध्य नहीं है,
धन का उपार्जन अपराध नहीं है,
धन की लिप्सा जब
सीमा लांघ देती है,
आदर्श सिद्धान्त खूटी
पै टांग देती है,
तब यह अर्थ ही अनर्थ हो जाता हैं,
जीवन तदर्थ प्रेमी व्यर्थ हो जाता हैं।
है स्वार्थ का धन एक ऐसा धन
जो निर्धन से छीना होता है
त्याग के हर एक आंसू में
सावन का महीना होता है
आलस्य में जीये अमृत भी पिये
वह खून का पीना होता है
मेहनत का पसीना जहां
भी गिरे कंकड़ भी नगीना होता है










