जो करे ओ३म् से प्रीत वही नर मुक्ति पाते हैं
जो करे ओ३म् से प्रीत
वही नर मुक्ति पाते हैं
जो मन को लेते जीत
वही नर मुक्ति पाते हैं
हीरा-जनम अमोलक है यह,
शुभ कर्मों से पाया।
इसकी कीमत को ना समझा,
धूल में इसे मिलाया।
विषयों में गयी है बीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो मन को लेते जीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो करे ओ३म् से प्रीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
रथ है शरीर, आत्मा स्वामी,
इन्द्रियाँ हैं घोड़े,
मन रूपी लगाम को बुद्धि,
ढीला कभी ना छोड़े।
फिर निर्मल होवे चित्त,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो मन को लेते जीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो करे ओ३म् से प्रीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
काम-क्रोध, मद-लोभ-मोह,
अहंकार में ना फँस जाना।
यम-नियमों का पालन करके,
जीवन सफल बनाना।
है धर्म ही सच्चा मीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो मन को लेते जीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो करे ओ३म् से प्रीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
सुख-दुःख, हानि-लाभ, यश,
अपयश में जो मुस्काए।
“नन्दलाल” वो ही प्राणी,
सच्चा मानव कहलाए।
हो जगत् में उसकी जीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो मन को लेते जीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
जो करे ओ३म् से प्रीत,
वही नर मुक्ति पाते हैं।
रचनाकार :- पण्डित श्री नन्दलाल जी आर्य
रथ है शरीर , आत्मा स्वामी (1)
इन्द्रियाँ हैं घोड़े (1)
मन रूपी लगाम को बुद्धि (1) :– तुलना कीजिये कठोपनिषद् में दिये रथ के उदाहरण के साथ :–
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयां स्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।।
(कठोपनिषद्-1.3.3-4)
एक रथ है जिसे घोड़े हाँक रहे हैं, उन घोड़ों के मुख में लगाम पड़ी है। यह लगाम रथ के सारथी के हाथ में है और रथ के पीछे आसन पर यात्री बैठा हुआ है। यात्री को चाहिए कि वह सारथी को उचित निर्देश दे जो लगाम को नियंत्रित कर घोड़ों को उचित दिशा की ओर जाने का मार्गदर्शन दे सके। यद्यपि किसी स्थिति में यात्री सो जाता है तब घोड़े निरंकुश हो जाते हैं।
इस उदाहरण में रथ मनुष्य का शरीर है, घोड़े पाँच इन्द्रियाँ हैं और घोड़ों के मुख में पड़ी लगाम मन है और सारथी बुद्धि है और रथ में बैठा यात्री शरीर में वास करने वाली आत्मा है। इन्द्रियाँ (घोड़े) अपनी पसन्द के पदार्थों की कामना करती हैं। मन (लगाम) इन्द्रियों को मनमानी करने से रोकने में अभ्यस्त नहीं होता। बुद्धि (सारथी) मन (लगाम) के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती है।
गीता 3/43 में भी कहा है :–
एवं बुद्धः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥43॥
आत्मा को लौकिक बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर अपनी इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर संयम रखो और आत्मज्ञान द्वारा कामरूपी दुर्जेय शत्रु का दमन करो।










