जो कभी थे हमारे फट कर के न्यारे न्यारे।

0
18

जो कभी थे हमारे फट कर के न्यारे न्यारे।

जो कभी थे हमारे
फट कर के न्यारे न्यारे।
वह आज सारे हमसे
कितनी दूर हो गये।।

जिस माता की गोद
में खेले जन्मे दूध पिया।
उस माता का जिगर चीरते
कम्पित हुआ ना हिया।।

पिड़ित मां की आहें
सुन-सुन के मुस्करायें।
कटट्ट दिल बनाये
कैसे क्रूर हो गये ।।1।।

अपने देश की भाषा
भेष से उनको प्यार नहीं।
ऋषियों की सन्तान
भी कहलाना स्वीकार नहीं ।।

कितना भी समझायें
लाखों प्रमाण दिखायें।
फिर भी समझ न पाये
बेसहूर हो गये।।2।।

जितने उनके पास जायें
वह उतने ही अलग हटें।
जब कभी भी दो दिलों
को सीयें सीने से अधिक फटं ।।

अपनाते अपनाते हम
प्यार का हाथ बढ़ाते।
चोटों पै चोटें खातें चूर-
चूर हो गये।।3।।

तन मन धन दिया लाज
लुटा दी वतन के टुकड़े किये।
शोभाराम प्रेमी पिंघले नहीं
फिर भी कट्टर हिये ।।

घड़े भर गये पापो के
प्रायश्चित पश्चातापों ।
अब हम विषधर सापों
के लिये मयूर हो गये।।4।।