जीवन संग्राम कहाये
जीवन संग्राम कहाये
हर दिवस को सुदिन बनाए
ये निशदिन धन-वैभव कमाए
जीवन संग्राम कहाये
बुद्धिमान् की मनन शक्ति ही
श्रेष्ठ पवित्र कर्म कराती
शोधन शोध को पाए
ये निशदिन धन-वैभव कमाए
जीवन संग्राम कहाये
ऋतमय साधना – ऋतव्रत मनीषा
जीवन में करते रहो धारण
ऋतवन् प्रबुद्ध हो जाए
ये निशदिन धन-वैभव कमाए
जीवन संग्राम कहाये
देवजुष्ट वाणी की धरोहर
अनृत को त्यागे जीवनभर
सत्य को ही अपनाएँ
ये निशदिन धन-वैभव कमाए
जीवन संग्राम कहाये
दानव तो जीता अनृत में
पापी पतित-जीवन ही गुजारे
देवों को सत्य सुहाये
ये निशदिन धन-वैभव कमाए
जीवन संग्राम कहाये
जीवन संग्राम कहाये
हर दिवस को सुदिन बनाए
ये निशदिन धन-वैभव कमाए
जीवन संग्राम कहलाये
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
रचना दिनाँक :- भाग 1/2 :-21/8/2021 (देखें क्रम संख्या 1102) और भाग 2/2 :-14/9/2021
राग :- यमनकल्याण
राग का गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा
शीर्षक :- ध्यानी बुद्धि से कर्म को पवित्र करते हैं भजन६७५वां(भा:१)
*तर्ज :-
सुदिन = अच्छा सफल दिन
संग्राम = युद्ध
ऋत = सनातन नियम
मनीषा = सुबुद्धि
देवजुष्ट = देवों द्वारा सेवित की हुई
दानव = राक्षस
अनृत = झूठ
पतित = गिरा हुआ
सुहाये = अच्छा लगना
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
ध्यानी बुद्धि से कर्म को पवित्र करते हैं
मन्त्र के पूर्वार्ध में मनुष्य जीवन का प्रयोजन सुन्दर काव्य भाषा में वर्णित किया गया है। मनुष्य का जन्म दिनों को सुदिन बनाने के लिए होता है। पशु आदि योनि में भगवान के आराधन साधन न थे, अतः जन्म सफर न कर सका दिनों को सुदिन ना बना सका।वैसे ही चले गए जैसे आए थे। अब उत्तम मानव तन मिला है जहां जीव को उन्नति के सभी साधन प्राप्त हैं। अभी यह यत्न ना करें तो कब करेगा? यह जीवन ऐसा वैसा नहीं है यह संग्राम का जीवन है। बहुतों को इकट्ठा होकर लड़ना पड़ता है बिना युद्ध के
जीवन सूजीवन, दिन सुदिन नहीं होंगे। दुर्योधन ने झूठ नहीं कहा था कि युद्ध के बिना सुई के अग्रभाग समान भूमि भी ना दूंगा। जो आलसी बन कर जीवन- सुख लेना चाहते हैं वे धोखे में है।
परिश्रम के बिना दैवी शक्तियां भी मित्र नहीं बनतीं। थकान नहीं, अतः विश्राम नहीं। परिश्रम नहीं, आराम नहीं। इसी भाव को लेकर कहा की उत्पत्तिमात्र से कुछ नहीं होता, जब तक पुरुषार्थ अध्यवसाय यत्न न किया जाए, जीवन चल नहीं सकता, सुजीवन -सुदिन तो दूर की बात है। चेष्टा में यत्न में जीवन है। वृद्धि है। देखिए जो बच्चा निश्चेष्ट पड़ा रहता है, उसकी बाढ़ रुक जाती है, वह अपाहिज हो जाता है। स्वस्थ बच्चा पड़ा पड़ा भी हाथ पैर हिलाता रहता है। उसका यही हाथ पर आदि का हिलाना चलाना उसकी वृद्धि का कारण होता है। इसलिए यहां विदथ=प्राप्ति से समर्य= संग्राम का ग्रहण किया। बढ़ने का प्रयोजन है लड़ना, पुरुषार्थ करना, स्ट्रगल तथा प्राप्ति। यदि प्राप्ति कुछ नहीं और केवल लड़ते ही रहे सारा जीवन संग्राम में बीत गया, तो व्यर्थ गया, अतः अन्धे होकर नहीं लड़ना चाहिए। लड़ना लड़ने के लिए नहीं। लड़ना साधन है साध्य नहीं अतः वेद कहता है–पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा–बुद्धिमान मनन शक्ति से, विचार शक्ति से कर्मों को पवित्र करते हैं।ज्ञान बड़ा शोधक है –गीता में कहा है–ज्ञान रूपी अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देता है अर्थात् कर्मों के दोषों को ज्ञान दूर कर देता है, अतः वेद ने कहा–साधन्नृतेन धियं दधामि।।ऋ•७.३४.८
मैं ऋतयुक्त साधना करता हुआ ऋतयुक्त बुद्धि को धारण करता हूं अर्थात कर्म के साथ बुद्धि को, ज्ञान को भी धारण करता हूं ।ज्ञानयुक्त कर्म करने वाले विद्वान को विप्र कहते हैं, ऐसा विप्र व्यर्थ नहीं बोलता। जब वह बोलता है सारयुक्त वचन बोलता है, अतः वेद कहता है कि विप्र देवविषयक वाणी बोलता है।
मनुष्य जीवन की सफलता देव बनने में है। देव बने बिना दैवी वाणी कैसे बोल सकेगा? देव बनने का साधन है ऋत- अनुसार अनुष्ठान।वह अनुष्ठान अनृत(झूठ)- त्याग के बिना सर्वथा असंभव है ।यज्ञ करने के लिए तत्पर यजमान दीक्षा लेते हुए कहता है। ‘इदमहमनृतात्यमुपैमि‘ यजुर्वेद 1/5
मैं अनृत(झूठ) का त्याग करके सत्य ग्रहण करता हूं। ऋत का एक अर्थ है यज्ञ है। यजमान प्रतिज्ञा करता है कि मैं यज्ञ- विरोधी भावों का त्याग करता हूं। ब्राह्मण ग्रंथों तथा वेदों में यह बात अनेक बार कही गई है कि देव यज्ञ करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला मनुष्य से ऊपर उठकर देवत्व को प्राप्त करता है ।
देव सत्यस्वरूप होते हैं ,मनुष्य अनृत अर्थात् मनुष्य अनेक बार ऋतविरोधी कर्म करता है किन्तु देवों के आचरण में अनृत= असत्य अवलेश मात्र भी नहीं होता। उनका जीवन- व्यवहार सत्य से ओतप्रोत रहता है। मानव जीवन का लक्ष्य देव- जीवन है। उनके लिए अनृतत्याग पूर्वक सत्य ग्रहण, सत्यधारण, अनिवार्य है। उसके बिना देवत्व सम्भव नहीं।
ओ३म् जा॒तो जा॑यते सुदिन॒त्वे अह्नां॑ सम॒र्य आ वि॒दथे॒ वर्ध॑मानः ।
पु॒नन्ति॒ धीरा॑ अ॒पसो॑ मनी॒षा दे॑व॒या विप्र॒ उदि॑यर्ति॒ वाच॑म् ॥
ऋग्वेद 3/8/5
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