जीवन भर जीना ना आया।
भेद जीवन का समझ न पाया ॥ जीवन भर…
होश तो आया हो गई देरी
जिन्दगी बन गई राख की ढेरी
मिली ना मुक्ति ना ही माया ॥ जीवन भर…
काम क्रोध मद मोह में घिरकर
विषयों में दुःख जोड़े गिनकर
आस लगाई वो भी झूठी
तृष्णा रह गई फिर भी भूखी
बिना त्याग माया नहीं फलती ॥ जीवन भर…
राग द्वेष निन्दा से जुड़कर
शरम गँवाई मैला मन कर
जिन्दगी बेबस निर्धन रहती
क्लेष दुःखों के क्रन्दन सहती
कली नहीं मुरझा के खिलती जीवन भर…
तू खुद को प्रभु के आश्रित कर
सत्य ज्ञान से मन जागृत कर
संयम से पा मन की शक्ति
तप से पा जीवन की मुक्ति
अनवुझ प्यास सुधा से भरती ॥ जीवन भर…
सफल जीवन कर ओ३म् को भजकर
वीतराग बन तृष्णा तजकर
मन को जो मिलती है तृप्ति
वो केवल है ईश्वर-भक्ति
जगी रहे नित ओ३म् की ज्योति ॥ जीवनभर…
(कंदन) रोने ने क्रिया (वीतराग) आसक्तिरहित, निस्पृह
तर्ज : असात होता संध्या छाया










