जिसने पर्वत, गगन, आग, पानी, पवन सब बनाया
जिसने पर्वत, गगन, आग,
पानी, पवन सब बनाया
हमने उस ईश में मन लगाया।
शब्द करती नदी बह रही है,
सन सनाती हवा कह रही है,
कैसी उन्मादनी, उस महादेव की,
मधुर माया ।।
हमनें उस ईश में मन लगाया
सच्चिदानन्द व्यापक विधाता,
विश्व दिन रात गुण जिसके गाता।
भक्तजन तारिणी, मृत्युभय हारिणी,
यस्य छाया ।।
हमने उस ईश में मन लगाया
न्यायकारी निराकार स्वामी,
शंभू शिव भक्त वत्सल नमामि ।
भक्ति का रस पिये,
मन में श्रद्धा लिये, गीत गाया।
हमने उस ईश में मन लगाया
ध्यान- मुद्रा में रस
मिल रहा है.
आत्मा का कमल
खिल रहा है।
ओ३म् सुखकन्द है,
आज आनन्द है,
पाल पाया ।।
हमने उस ईश में
मन लगाया।










